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जायजा

याद रखना भले भूल जाना, याद रखना भले भूल जाना, ये जो परिवेश है, तुम्हारा अपना है, जिम्मेदार बनो या श्रीकृष्ण कह दो. एक परिंदा जो उड़ता है आकाश में, तुम्हारे घरों की छत भले शहर हो या गाँव हो ! धूप की भी है उसे खबर, भूल गया तू तुझे नहीं है खबर, पेट भरता नहीं या नहीं है खबर, परिंदों को भी है खबर, तेरी व्यवस्था इधर या उधर, बंधन हैं तुम्हारे अपने, पहरे सीमाओं से होंगे जिधर, वो धार्मिक ही नहीं, जो छीन ले निवाले, उसके होने के नाम पर,

परीक्षा

रहे हमेशा तैयार, करते रहे प्यार, छोड़ कर दासता, रखें खुद से वास्ता, . दर दर की ठोकरें, किसका मलाल छौकरे, पग पग खडी है परीक्षा, क्यों लड़ना भागना क्यों, . रहें हमेशा तैयार, करते रहे प्यार, . कब तक सोये रहोगे, उतना ही खोते जाओगे, मना लो जागरण, प्रेम उमड़ आयेगा, . रहे हमेशा तैयार, करते रहे प्यार, . गुरु बनेगी तेरी ही चेतना, मिट जायेगी सब वेदना, चाहे जिसे तुम भेदना, संजीदा रखें बस संवेदना, . रहे हमेशा तैयार, करते रहे प्यार, . प्रकृति अस्तित्व नहीं कोई योजना, ये ही है वो रहस्य, जिसे सबको है जानना, विरासत नहीं ये किसी की, . रहे हमेशा तैयार, करते रहे प्यार.

चैन भी बेचैन

चैन भी बेचैन जागे सारी रैन रैन बसेरा सोये सुबेरा छूट गया सहारा चुके न कर्ज़ भूल गये फर्ज़ सिखना तर्क पकड सको मर्ज ये मृत्यु नहीं, हत्या है. भूखे भी प्यासे भी, विलुप्त साधन संसाधन, थाली बजे, पैदाइश गायब, ताली बजाते. डरे हुए सब, मोमबत्तियां जले फूटते पटाखे वंचितों के अधिकार, हाशिये पर लगे, गिरते है फूल गिरे जिनके लिए, बोझिल झोली, न सिर्फ़ फटी, दुबारा सिल न सकी, प्रकृति ने जिसे, सबको दिया, खुली हवा, लाल सूरज, लिया छुपा, ये मृत्यु सहज नहीं, सरेआम हत्या है. हंस जो निहत्था है.

ईश्वरीय नहीं इंसानी विनाश का मॉडल

IITian मुख्यमंत्री है B.Tech कवि "कोई दिवाना कहता है, M.B.B.S चिकित्सक कोई सांसद तो कोई spokesperson. Ayush वाले भी कोई मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, तो कोई contract base पर आजीविका का मोहताज़, जिनके पास कोई डिग्री/डिप्लोमा नहीं, वे बडी बडी संस्थाओं के मालिक मेरे आसपास. फार्मेसी पंजीकृत नामांकरण किसी के नाम बैठा महारथी है मैट्रिक परीक्षा खास. . मतलब पढाई तय नहीं करती आपका कार्यक्षमता कार्यक्षेत्र क्या होगा, नेता का बेटा नेता, डॉक्टर का बेटा डाक्टर चाहे देना पड़े डोनेशन कई लाख, पूँजीवादी अय्याशी विशेष. सजदे CEO समूह के खास. . जिससे पास नहीं कोई डिग्री मैनेजिंग डायरेक्टर उनके साथ, जनता तय करती पहुंचे उनके पास, है झोलाछाप खास या mbbs पास. . स्वामी बन बनाते रणनीति खास, करें दान दिल खोलकर होगी उन्नति खास, पत्थर ठीकर हैं नहीं चीज़ कोई खास. जर,जोरू और जमीन लडाई की जड़ तीनों, नहीं संभलने वाली तुमसे हम साधु खास. मुँह में राम बगल में छुरी चिंतन खास हमरे पास. . पंडित ज्योतिषी जन्मकुंडली के कौन आधार, जो जन्मभूमि, कर्मभूमि रणभूमि तय कर सकी ना प्रकट हुए न आसपास... . ...

संपादकीय कोविड19 पर दो बुद्धिजीवी.

Dr. Yashwant Choudhary from Facebook channel (Sikar Times) criticize Dr. Biswaroop Roy Chowdhury. सम्पादकीय:- डॉक्टर यशवंत चौधरी अपने "सीकर टाइम्स" फेशबुक चैनल पर विडिओ मे कुछ ऐसा कहते हैं. डॉ. बिश्वारूप बंगाल साइड के चौधुरी है. यशवंत राजस्थान साइड के. वे आप से रिलेट नहीं करते. अब हरियाणा और यूपी से भी शेष है. यशवंत को वे नकली चौधरी लगते है. सचेत रहने की सलाह देते है. जबकि डॉ.बिश्वारूप रॉय चौधुरी. मधुमेह विषय पर Ph.D हैं.  रक्तचाप कैंसर जीवनशैली से जुडी बिमारियों का Diet Management द्वारा 3 day step से बुखार, शूगर, आदि ठीक करते है. शरीर को चिकित्सक मानते है. डॉक्टर साहब दूसरों पर नजर या आकलन में कई बार आदमी, खुद की बड़ी गलतियों से चूक जाता है. अब ये भी चलन पडेगा. मैं हरियाणा का यादव राव साहब हूँ. बिहार उत्तरप्रदेश वाला नहीं. कल को उपजातियों में श्रेष्ठता को लेकर विषय उठेगा. . वे diabetes m में Ph.D हैं आपका विषय अलग है.आप भी Ph.D होंगे. या आपने अपना विषय का जिक्र किया है. आप Drug Bacteriology, Virology पर कुछ हैं. Scam क्या है. संदेश ??? आप ...

मजदूर की व्यथा

एक मई विश्व मजदूर दिवस पर. पुस्तक "जीवन एक अभिव्यक्ति" लेखक:- डॉ. महेन्द्र सिंह हंस. प्रकाशन:- राजमंगल पब्लिशर्स *मजदूर की व्यथा* दो वक्त की रोटी को, जिंदगी छोटी पड़ जाती है, सुबहा का निवाला खाकर, जब धूप निकल आती है. . दिनभर सहा कष्ट भरपूर, कष्ट और गहरा जाता है, मिलती नहीं पगार, जब भूखे ही सोना पड़ जाता है, . लाया था फटे पुराने कत्तर, चुग बीणकर, बैंया पक्षी को घोंसला बुनते देखकर, तम्बू बनाया इनको गूथकर, कंप कपाती ठण्ड से बच पांऊगा, ऐसा सोचकर, कमेटी वालों ने, इसे भी तोड़ दिया, गैर कानूनी सोचकर. . जीवन एक मजदूर का, है अति-कठिनाइयों से भरा हुआ, सेठ लोग भी ये कहते है, हम भी निकले हैं इसी दौर से, हम भी तो कभी मजदूर थे, वो पूर्वज थे आपके, जो सेठ कहलवा गये, वरन् मजदूरी कैसे होती है. मालूम नहीं आज आपको, . पूरे दिन साहब साहब मजदूर करे, देते नहीं फूटी कौडी पास से, रोते बिलखते होंगे बच्चे उनके भी, फिर भी दिल विनम्र होता नहीं. . दो वक्त की रोटी को, जिंदगी छोटी पड़ जाती है, सुबहा का निवाला खाकर, जब धूप निकल आती है. (अर्थात सूर्योदय से पहले उठकर म...

सिक्के व्यवहारिक होते है (लेख)

भले सिक्के जिंदगी में व्यवहारिक होते हैं, वे भी केवल मनुष्यों में, परिवार/समाज/देश/विदेश/मुद्रा पर व्यवहार चलन में है, बात तोलने की हो, बात पहलुओं की हो, बात क्षमता की हो, बात सिक्कों के खनक की हो, बात ईमान/बेईमानी की हो, बात संपदा/वैभव/राजपाट की हो, कहावत :- जिसके कमलेविच् दाने.. उसके पगले भी सियाणे. बात विचारधारा/चलन/रीत-रिवाज/धार्मिक-आधार इससे वंचित नहीं है. धार्मिक ठगी, जगजाहिर है, कर्म के आधार पर विभाजन हो, या जातिगत आधार. सबके पीछे मूलभूत आधार सिक्के ही है. प्रथा चाहे विधान/मनुस्मृति जनेऊ-क्रांति हो, जमींदार-प्रथा हो, स्त्रियों को दाँव पर लगाने की हो, या फिर ढोर यानि आधार गाय या गोपाल की लीला केंद्र हो, भेदभाव के पर्दे के पीछे आधार चंद सिक्कों के खनक की ही मिलेगी, शूद्र वर्ग के लोगों और उनकी विवाहताओं पर प्रथम अधिकार जनेऊधारी का होगा, न उन्हें संपत्ति संपदा तो दूर की बात, सार्वजनिक स्थलों पर जाने की रोक, बल्कि बहिष्कृत कर जंगलों या असुरक्षित स्थानों पर रहने को मजबूर किया गया, वैसे तो वो बलिष्ठ थे, लेकिन मानसिकता को कुचला गया, ताकि वे हीनभावना से ग्रसित...